काम कम..बदनाम ज्यादा !

सांसद मनोज तिवारी की बदजुबानी के नाम रहा छठ पूजा का पहला दिन। मुद्दे पर  बात होने की बजाए सांसद जी के बिगड़े बोल पर बस सियासत चलती रही। लगता है कि सांसद जी पहले तो समझ नहीं पाते हैं, समझने में टाइम लगाते हैं, समझते कुछ हैं समझा कुछ जाते हैं। क्यों ऐसा कहा जा रहा है इसे समझने के लिए सारे घटनाक्रम को शुरू से समझना होगा।

छठ पूजा पर लगे बैन के बाद से ही दिल्ली में रहने वाले बिहार व पूर्वांचल के लोगों के बीच भारी असंतोष हावी रहा है। इस बात को सवा सौ घंटे से ज्यादा का वक्त निकल गया है। सड़कों पर, घाटों पर, हर जगह प्रदर्शन हो गया, यहां तक बात कोर्ट तक भी पहुंचाई गई। सरकारों के नकारेपन को नजरअंदाज करते हुए नकार दिया गया लोक आस्था के इस महापर्व की महता को। कोई बात नहीं, लोकतंत्र में जनता को मौका जरूर मिलता है। जब मौका मिलेगा तो बात रखने की बात कह ही चुके हैं छठ पूजा समिति से जुड़े लोग।

लेकिन इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का लाभ लेकर सियासी सुख साध रहे सांसद जी पूरे प्रकरण में लापता रहे। सांसद जी की नींद खुली जब छठ पूजा की शुरुआत हो गई। दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचली वोटरों की वजह से ही आज वे इस मुकाम पर हैं। दूसरी बार उत्तरी दिल्ली की प्रतिष्ठित सीट से सांसद चुने गए। बकायदा दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष बनने का गौरव भी हासिल हुआ उन्हें। यहां तक कि दिल्ली के सीएम तक का सपना उफान मार गया। उनकी इन सब उपलब्धियों के पीछे सबसे बड़ी वजह क्या रही सब जानते हैं। दिल्ली में रहने वालों लाखों पूर्वांचली वोटरों का दम सब पहचानते हैं। वे अच्छा गाते हैं, अच्छा नाचते हैं, सरस्वती की साधना करते हैं, लक्ष्मी का आर्शीवाद है उन पर। लेकिन दिल्ली के लिए समर्पित भाव से कभी कुछ बड़ा किया हो, ऐसा न तो पहले कभी हुआ और  न अब तक हुआ है। यहां तक कि उनके कोर वोटरों को भी उनसे हमेशा निराशा ही हाथ लगी।

होना तो यह चाहिए था कि इस संकट की घड़ी में वे अपने पूर्वांचली समाज के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करते। उनकी आवाज को बुलंद करते। दिल्ली के एलजी और सीएम से इस मुद्दे पर मुलाकात करते। उन्हें समझाते कि नदी के घाटों पर ही छठ पूजा की सच्ची सार्थकता है। समय रहते बात करते, कुछ ठोस समाधान निकालने की दिशा में काम करते। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उल्टे पूजा के पहले दिन ही बदजुबानी करके पूरा माहौल खराब कर दिया। बात सही कह रहे थे, अभी जब दिल्ली से जुड़े सारे अहम फैसले सीएम केजरीवाल ही ले रहे हैं तो छठ पूजा का नियंत्रित आयोजन भी वे करवा हीं सकते थे। लेकिन सीएम के लिए अपशब्द का इस्तेमाल सही नहीं ठहराया जा सकता। अब इस मामले में चुप्पी साधे आम आदमी पार्टी के नेताओं को बोलने का मौका मिल गया।

संस्कृति को बचाने की लड़ाई गैर-सांस्कृतिक अंदाज में ठहर गई।

 

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