बुद्धिजीवी Vs श्रमजीवी

यूपी के एक किसान से बात करते वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम

एक किसान सरकार का विरोध करे तो अच्छा..वो खालिस्तान समर्थकों से पैसे लेकर फाइव स्टार फैसिलिटी वाला लेकर आंदोलन चलाए..सब जायज है। गणतंत्र के पावन उत्सव वाले दिन देश के गौरव..लालकिला पर तिरंगे को अपमानित करता है..वो ठीक है…लेकिन उसी किसान समाज का ही एक किसान सरकार के समर्थन में कुछ कहे तो गलत है..वो मूर्ख है..उसके पास अपने सोचने समझने की बौद्धिक क्षमता नहीं है। उसके दिमाग को किसी ने हाइजैक कर लिया है..जिसके प्रभाव में वो इस तरह से सरकार के समर्थन वाली बातें कह रहा है।

ये बड़ा संदेश देते दिखे टीवी न्यूज इंडस्ट्री के बड़े पत्रकार अजीत अंजुम। बड़ा नाम है..न्यूज 24 और इंडिया टीवी जैसे बड़े संस्थानों में बड़े पद पर रहे। कह सकते हैं आज जो इंडस्ट्री के हालात हैं उसमें बड़ा योगदान रहा है इनका।

इंडस्ट्री के लोग इस कद के लोगों से सीखते रहे हैं। पद पर रहते इतनी स्पष्टता से जो चीजें नहीं सीखा सके..नये प्रयोग नहीं कर सके..उस दिशा में अब बहुत कुछ नया सीखा रहे हैं।

कैसे आम आदमी का मजाक बनाया जा सकता है..? कैमरे पर उसकी ईमानदार अभिव्यक्ति पर ऑन स्क्रीन मूर्खता का टैग लगाया जा सकता है..? यूपी का साधारण सा एक किसान अपनी समझ से बता रहा है कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने से वहां भारत की पकड़ मजबूत हुई है। मोदी सरकार बनने के बाद खेती किसानी के हालात सुधरे हैं। तेल कीमतों को लेकर उसके विचार स्पष्ट हैं कि ये अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जुड़ा मामला है। इलाके में मुसलमानों के वर्चस्व से परेशानी बढ़ जाती है। उसे ज़ी न्यूज देखना पसंद है। लेकिन कुछ भी सही तरह से सुनने समझने की बजाए अजीत जी उसकी बात में अपनी बात मिलाते हुए..उसे मूर्ख साबित करते दिखते हैं।

टीवी न्यूज के नियम तो यही रहे हैं कि आपको पब्लिक के ओपिनियन का सम्मान करना है। वो पक्ष या विपक्ष किसी भी तरह के विचार आपके सामने रख रहा है..उसे उसी तरह रिकॉर्ड करना है। बेशक उसके बाद आप उसे चलाए या ना चलाएं..या फिर कितना चलाए..ये संस्थान या फिर आपकी सोच..स्टोरी लाइन पर निर्भर करता है। हालांकि पिछले कुछ सालों में काफी कुछ बदला है..लेकिन अजीत अंजुम जी का ताजा वीडियो कुछ बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। एक नए टकराव की तरफ इशारा कर रहा है। इस तरह से अपने बौद्धिक बल से साधारण से किसी श्रमजीवी का मजाक बनाना..आने वाले समय में टीवी न्यूज की चुनौतियां बढ़ा सकता है। आप किसी आम आदमी की राय से असहमत हो सकते हैं..ऑन स्क्रीन उसके साथ वाद विवाद कर सकते हैं..लेकिन उसकी पसंद..उसकी प्राथमिकता का मजाक बनाना..उसकी व्यवहारिक समस्या को सुनने समझने की बजाए..उसे हल्का बताते हुए उसे बौद्धिक तौर पर दिवालिया साबित करना..वो भी इस स्तर के पत्रकार के द्वारा..बता रहा है कि आने वाले समय में और भी बहुत कुछ बिगड़ने वाला है।

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