‘सैलरी आधी मिली – सियासत पूरी देखनी बाकी’

नॉर्थ एमसीडी के इलैक्ट्रीकल एवं मैकेनिकल विभाग के कर्मचारियों ने जुलाई तक की सैलरी मिलने के बाद तीसरे दिन अपनी हड़ताल खत्म कर दी। इन्हें समझाने और मनाने खुद उत्तरी दिल्ली नगर निगम के महापौर जय प्रकाश पहुंचे। उन्होंने आश्वासन दिया है कि जल्दी ही उनकी बकाया सैलरी भी मिल जाएगी। दिवाली के बाद उच्च अधिकारियों के साथ इन कर्मचारियों की बैठक करवाई जाएगी। जिसमें उनकी बाकी की मुख्य मांगों – 1. प्रमोशन, 2. अस्थाई/डेली वेज कर्मचारियों को पक्का करना, 3. एरियर का पैसा( मीट्रिक, नॉन-मीट्रिक) के समाधान का रोडमैप तैयार किया जाएगा।

लेकिन इसके साथ ही महापौर जय प्रकाश ने सभी कर्मचारियों से दिल्ली सरकार के पास फंसे 13 हजार करोड़ रुपए निकलवाने में सहयोग करने का आश्वासन भी लिया। संकेत तो यही मिला कि सैलरी पर जारी सियासी घमासान अभी थमने वाला नहीं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट करने की कोशिश की कि मौजूदा सैलरी संकट के लिए पूरी तरह दिल्ली सरकार ही जिम्मेदार है। जब से दिल्ली की सत्ता पर आम आदमी पार्टी की सरकार बैठी है तभी से यह संकट ऐसे गहराया है। पहले शीला दीक्षित की सरकार होती थी, तब कभी भी ऐसी स्थिति नहीं बनी। उससे पहले जब दिल्ली में बीजेपी की सरकार थी और एमसीडी में कांग्रेस, तब भी कभी दिक्कत नहीं हुई। कोई समस्या आती तो मिल बैठ कर समाधान निकाल लिया जाता था। लेकिन केजरीवाल सरकार ने तो मानो ठान लिया है कि एमसीडी के हक का पैसा भी नहीं देंगे। कई ऐसे टैक्स होते हैं जो दिल्ली सरकार के पास जमा होते हैं जिसमें एमसीडी का हिस्सा होता है। साथ ही केंद्र सरकार जो पैसे दिल्ली सरकार को देती है उस फंड में भी एमसीडी की हिस्सेदारी होती है। ये पैसे एमसीडी को नहीं मिलेंगे तो कैसे काम होगा? ये तो सीधे तौर पर हक मारने वाली बात है। राज्य वित्त आयोग जिसका गठन दिल्ली सरकार ही करती है, उसकी अनुशंसा किए हुए पैसे भी देने को राजी नहीं हैं। पिछले तीन किश्तों को मिलाकर कुल साढ़े छह हजार करोड़ रुपए दिल्ली सरकार को निगम को देने हैं।

जहां तक प्राप्त हुए पैसे के खर्चे को लेकर प्राथमिकता तय करने में चूक का मामला है, महापौर जय प्रकाश ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकता डी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन सबसे पहले देने की ही रहती है। लेकिन कई बार विशेष परिस्थितियां बन जाती हैं तो आगे पीछे हो जाता है। उन्होंने कर्मचारियों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि दरअसल यही वो वर्ग है जो सही मायने में निगम है। इन्हीं पर सब निर्भर करते हैं। ये नगर निगम के सिपाही हैं, इनका खुश रहना जरूरी है। तभी दिल्ली साफ-सुधरी और बीमारी मुक्त रह सकती है।

दिल्ली के सीएम तो विज्ञापन के दम पर श्रेय लेने का काम करते हैं। जबकि जमीन पर मोर्चा तो निगम ने ही थाम रखा है। चाहे कोरोना महामारी हो, डेंगू हो, जल-जमाव की समस्या हो, सड़कों का रख-रखाव, कॉलोनियों की साफ-सफाई हो सारे काम निगम करती है। हर महीने विज्ञापन पर खर्च होने वाले करीब 50 करोड़ रुपए के फंड का ही कमाल है, जिसकी वजह से मीडिया में उनकी बातों को ज्यादा जगह मिलती है। एक बार यह फंड रोक कर तो देखें, खुद ब खुद सच सामने आ जाएगा।

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