लापरवाही ने बढ़ा दिया कोरोना का खतरा

दिल्ली में कोरोना बहुत नियंत्रित हो चुका था। पर्याप्त मात्रा में टेस्ट हो रहे थे। सरकार सतर्क थी और दिल्ली की जनता भी सजगता से अपना बचाव कर रही थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों में कई स्तर पर लापरवाही के मामले देखने को मिले जिसने कोरोना संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ा दिया।

सबसे पहले नंबर पर रहा त्योहारों को लेकर दिल्ली के आम लोगों और दूकानदारों का अतिउत्साह। दशहरा तो फिर भी सुरक्षित गुजर गया, लेकिन दिवाली पर लोगों का धैर्य मानो जवाब देता दिखा। लोगों ने महीनों से पालन करते आ रहे सारे बंधन, नियम-कानून तोड़ दिए। बिना मास्क के बाहर घूमते लोग बड़ी संख्या में दिखने लगे। तकरीबन हर छोटे बड़े बाजारों में बेतहाशा भीड़ देखी गई। सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ती दिखी।

लोग तो लापरवाह दिखे ही साथ ही दिल्ली के व्यवसायियों ने भी सारे नियम तोड़ दिए। शुरू के दिनों में जिस तरह लाइन लगा कर लोगों को समान देना, दूर से समान पकड़ाना, बिना मास्क के आए ग्राहकों को वापस लौटा देना, सैनिटाइजर का प्रयोग आवश्यक करना आदि तमाम तरह के ऐहतिहात बरतते रहे दूकानदारों ने मानो दिवाली में कोरोना को ही बंपर छूट दे दी। विशेषकर चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली के अन्य बाजार, सदर, सरोजनी नगर, गांधी नगर जैसे थोक बाजार वाले इलाके में तो लगा जनसैलाब सा उमड़ पड़ा। कमाई तो खूब हुई लेकिन जान पर आफत आ गई।

सारी परिस्थियों को देखते हुए भी दिल्ली का शासन प्रशासन इस मामले को नजरअंदाज करता नजर आया। तभी तो इतने बड़े स्तर पर लापरवाही संभव हो सकी। अगर इसकी गंभीरता को समझा जाता तो ऐसी परिस्थिति बनती ही नहीं। आज जब संकट काफी बढ़ गया तो आनन फानन में सख्ती और जुर्माना थोपा जा रहा है। दिल्ली सरकार की तरफ से जुर्माना बढ़ाए जाने के बारे में लोगों को जागरूक भी नहीं किया गया। अचानक से दो हजार की चपत इस आर्थिक संकट के दौर में आम लोगों के लिए घातक साबित हो रही है।

आज कोरोना संकट के बढ़ने की एक और बड़ी वजह प्रदूषण भी माना जा रहा है। पराली की वजह से दिल्ली में जिस तरह के हालात बन गए थे। धूंध और धूंए की चादर सी बिछी रही दिल्ली के उपर। जाहिर है ऐसे माहौल में कोरोना का संक्रमण तेजी से फैलेगा ही। पराली को लेकर बस पॉलिटिक्स ही होते दिखी। केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार दोनों ही दिल्ली पर छाए पराली संकट का तुरंत कोई ठोस समाधान देते नहीं दिखे। ऐसा लगा कि दिल्ली के उपर से पराली का धुंआ गुजरने का बस इंतजार कर रहे हों।

एक तरफ दिल्ली में पराली संकट पर तमाम तरह के सियासी और प्रशासनिक दावे और बयानबाजी चलती रही तो वही दूसरी तरफ लगातार पास के राज्यों से पराली जलाने की खबरें आती रही। यहां तक कि दिल्ली सरकार के बायो डिकंपोजर वितरण के दावे की पोल भी खुलती दिख रही है। कहा जाता रहा, चैनलों को विज्ञापनों से पाट दिया गया कि दिल्ली के किसान अब पराली नहीं जला रहे हैं, उन्हें दिल्ली सरकार मुफ्त में पराली को खाद में बदलने वाला रासायनिक घोल उपलब्ध करवा रही है। लेकिन अब खबरें आने लगी हैं कि दिल्ली के किसानों के खेतों में पराली के ढ़ेर लगे हैं। उन्हे समझ नही आ रहा कि इस समस्या से कैसे निपटें। दिल्ली बीजेपी मुखरता के साथ इस मुद्दे पर दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार को घेरने में जुट गई है।

मतलब साफ है कि दिल्ली में प्रदूषण का कोई भी ठोस समाधान देने में सरकारें नाकाम रही हैं। इसी का नतीजा है कि एक बार फिर दिल्ली में कोरोना संकट हावी हो चला है। रोजाना 4 से 5 हजार के बीच संक्रमितों की संख्या पहुंच गई है। हर दिन सौ से अधिक लोगों की कोरोना की वजह से जान जा रही है। सिस्टम हालात को संभालने के लिए हाथ-पांव मारता दिख रहा है। लेकिन बड़ा बदलाव तभी संभव है, जब आम लोग एक बार फिर सजगता और जिम्मेदारी के साथ इस कोरोना जंग में साथ आएंगे और मुस्तैदी से लड़ेंगे।

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