‘उपमुख्यमंत्री’ – देश की सियासत में दमदार उपस्थिति दर्ज

बिहार में बीजेपी ने एक महिला को उपमुख्मंत्री का पद दिया। सामान्य सी दिखने वाली इस घटना के असामान्य सियासी संकेत हैं। दरअसल यह देश की सियासत में महिला शक्ति की जोरदार धमक है। जिसके आगे सिर झुकाया है देश की सबसे ताकतवर पार्टी ने। हैसियत के हिसाब से हिस्सेदारी तय हुई। अभी तक देश की सियासत में महिला प्रतिनिधित्व का विशेष स्वरूप रहा। किसी की पत्नी, बेटी या बहू बन कर ही वह शीर्ष सत्ता तक पहुंच बना पाई। हालांकि कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो अपनी काबिलियत के दम पर सत्ता की कमान थामने में सफल रही। लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो कुछ बिहार में घटित हुआ। वो सबको चौंकाने वाला रहा। बिहार चुनाव की दशा जो भी रही हो, किसी के पक्ष में तेज सियासी बयार बह रही हो, इसकी दिशा बदलने का काम किया बिहार की महिलाओं ने। सारे के सारे राजनीतिक पंडित, चुनावी विश्लेषक फेल हो गए। बिना किसी शोर-शराबे के साइलेंट महिला मतदाताओं ने एनडीए को आगे बढ़ा दिया। सब दंग रह गए।

इस शांत सियासी करेंट को पहचाना एनडीए के शीर्ष नेतृत्व ने और सम्मान देते हुए रेणु देवी को बिहार की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के गौरव से नवाजा। वो भी भाई दूज के विशेष दिन। खास मौके पर सबसे खास उपहार, वुमन पावर को विशिष्टता का एहसास। इस बार विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या बेशक कम रही लेकिन जो ताकत महिला मतदाताओं ने दिखाई उसके आगे सभी नतमस्तक दिखे।

देश की आधी आबादी की ताकत को समझिए। बिहार चुनाव के बाद सामने आए आंकड़े स्पष्टता के साथ इस ताकत का एहसास करवा रहे हैं। तकरीबन 60 फीसदी महिला वोटरों ने अपने मत का प्रयोग किया। 11 विधानसभा सीटों पर तो महिला वोटरों की संख्या 70 प्रतिशत तक रही। नक्सल इलाकों में भी महिला वोटरों ने ही बाजी मारी। वही बिहार चुनाव में पुरूष वोटरों का ओवरऑल वोट प्रतिशत 55 के करीब ही रहा। 38 में से 23 जिले ऐसे रहे जहां पुरूषों के मुकाबले महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग अधिक किया। तमाम ऐसे संकेत सामने आ रहे हैं जो साफ बता रहे हैं कि इन्हीं जागरूक महिला मतदाताओं ने निराश, हताश पड़ी एनडीए को जीत का जश्न मनाने का मौका दिया। यही वजह रही कि चुनाव परिणाम वाले दिन देर रात को जब बीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई तो बारी बारी से बिहार चुनाव की कमान संभाल रहे सभी बीजेपी नेताओं ने महिला वोटरों को नमन किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बिहार में स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद अपने ट्विट में इस मातृशक्ति को नमन करके आभार व्यक्त किया।

“बिहार की बहनों और बेटियों ने इस बार रिकॉर्ड संख्या में वोटिंग कर दिखा दिया है कि आत्मनिर्भर बिहार में उनकी भूमिका कितनी बड़ी है। हमें संतोष है कि बीते वर्षों में बिहार की मातृशक्ति को नया आत्मविश्वास देने का एनडीए को अवसर मिला। यह आत्मविश्वास बिहार को आगे बढ़ाने में हमें शक्ति देगा।“ –  नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या ने भी बिहार की महिला वोटरों को सबसे महत्वपूर्ण मतदाता बताया। उन्होंने कहा कि वे रैलियों में, रोडशोज में नहीं दिखती, न ही टीवी चैनल उन्हें कवर करते हैं, लेकिन वे एक शांत बहुमत हैं। हालांकि वे इसका श्रेय मोदी सरकार की मुफ्त गैस कनेक्शन, नल का पानी, पक्के मकान, शौचालय, सेनेटरी पैड जैसी योजनाओं को देते हैं।

लेकिन बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो कुछ भी बिहार की महिलाओं के लिए किया है उसे भी जरूर याद करना चाहिए। नीतीश के शुरुआती शासनकाल में ही सबसे पहली और आकर्षक योजना स्कूली छात्राओं के लिए साइकिल वितरण की थी। जो एक सामाजिक क्रांति की तरह सामने आई। गांवों के कच्चे रास्तों पर साइकिल से स्कूल जाती लड़कियों का झुंड सकून देने वाला रहा। और तो और नीतीश सरकार ने छात्राओं को वित्तीय सहायता भी उपलब्ध करवाई। उसके कुछ सालों के बाद ही सरकारी नौकरी के लिए होने वाले प्रतियोगिता परीक्षाओं में लड़कियों की उपस्थिति बढ़ते हुए सबने देखा। नौकरी लेने वालों में भी लड़कियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ।   

इसी तरह बिहार में शराब बंदी पर जबरदस्त शोर-शराबा मचा, जो अभी भी जारी ही है। लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा ग्रामीण महिलाओं को मिला। पारिवारिक कलह की सबसे बड़ी वजह बन गई थी शराब। विशेषकर देसी शराब बड़ी संख्या में ग्रामीण युवाओं की मौत की वजह बन रही थी। शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के साथ पैसे की बर्बादी का दंश महिलाओं को ही झेलना पड़ता था। साल 2016 में महिला स्वयं सहायता समूहों की मांग पर ही नीतीश कुमार ने शराब बंदी की घोषणा की थी।

महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान नीतीश सरकार ने किया। पंचायत और नगरनिकाय चुनावों में महिलाओं की पचास प्रतिशत हिस्सेदारी सुनिश्चित कर बड़ा दांव खेल दिया।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक के साथ राजनैतिक हैसियत बढ़ाने के लिए जो कदम उठाया था उसके नतीजे आज सबके सामने हैं। तमाम कयासों को फेल बताते हुए बिहार की साइलेंट महिला वोटरों ने खेल बदल दिया और फिर से नीतीश कुमार को सत्ता शीर्ष पर बैठा दिया। और इसके साथ ही देश की सियासत में महिला शक्ति की शुद्ध अपनी पहचान उभरी है। जो साफ संकेत दे रही है कि इसका सम्मान हर सियासी दल करे क्योंकि इसका विस्तार तय है।

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